शिमला। हिमाचल प्रदेश में दिन बीतने के साथ पंचायत चुनाव को लेकर लगातार बढ़ रही सरगर्मियों के बीच विवि के अंतर्विषयक विभाग के पंचायती राज आस्थाओं के सुदृढ़ीकरण में जनसहभागिता की चुनौती विषय पर ऑनलाइन सर्वेक्षण में बड़े हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं।
इस सर्वे की मानें तो हिमाचल प्रदेश के करीब 90 फ़ीसदी लोग आपसी सहमति से पंचायतों के प्रतिनिधियों को चुनना चाहते हैं। इसके पीछे की वजह यह है कि इससे पंचायत के कार्यक्रमों को लेकर टकराव नहीं रहता, साथ ही लोगों के आपसी संबंध भी मधुर बने रहते हैं। प्रदेश की जनता का मानना है कि चुनाव रिश्तों में टकराव पैदा करते हैं।
20 से 26 दिसंबर के बीच किए गए इस ऑनलाइन सर्वे में प्रदेश के 12 जिलों के 60 खंडों, 333 पंचायतों के 552 लोगों को शामिल किया गया। जिसमें 77.2 फीसदी पुरुष 22.8 फीसदी महिलाएं शामिल हुई थीं। वहीं, 49.1 फीसदी युवक छात्र या बेरोजगार इस सर्वे में शामिल हुए थे। इनमें से 87.8 फीसदी लोगों ने माना है कि पंचायत स्तर की राजनीति से विकास में अड़चनें पैदा होती हैं।
बलकुल सर्वे, जनता मानती है कि निर्विरोध पंचायतें चुनी जाएं, तो विकास तेजी से होगा। वहीं, 50 फीसदी लोगों का मानना है कि सहमति से पंचायत चुनना काफी मुश्किल है, मगर इसके लिए प्रयास जरूर किए जाने चाहिए। जबकि प्रदेश 75 फीसदी लोग यह मानते हैं कि चुनाव पार्टियों के चुनाव चिन्ह के आधार पर ही आयोजित कराए जाने चाहिए।
इसके अलावा सूबे के 57.2 फीसदी लोगों का मानना कि चुनाव पार्टी चुनाव चिन्ह पर होने से विकास कार्य क्रियान्वयन की जिम्मेदारी व्यक्तिगत न होकर दल या पार्टी की होगी, इसके साथ ही विपक्ष भी खुलकर दूसरे पक्ष की आलोचना कर सकेगा। जो कि आज के माहौल में संभव नहीं है।
वहीं, सर्वे में शामिल हुए 83.2 फीसदी लोगों ने माना है कि ग्राम सभा का कोरम पूरा न होने से स्थगित होती है और इस वजह से क्षेत्र का विकास भी रुक जाता है। वहीं, 55.7 फीसदी लोगों ने बताया है कि घर-घर जाकर साइन लेकर कोरम पूरा करवाया जाता है। इसी तरह सर्वे में 83.8 फीसदी लोगों ने कहा है कि पंचायत कार्य में और पारदर्शिता लाने की काफी ज्यादा जरुरत है। वहीं, 78.4 फीसदी लोगों ने माना है कि ग्राम सभा में जन सहभागिता बढ़ाना अहम् मुद्दा बनना चाहिए।




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