हिमाचल का वो राजा: जिसने चीन के शिनजियांग से पाक के खैबर पख्‍तूनख्‍वां तक किया राज

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हिमाचल का वो राजा: जिसने चीन के शिनजियांग से पाक के खैबर पख्‍तूनख्‍वां तक किया राज

शिमला। जम्‍मू-कश्‍मीर और लद्दाख से जुड़ी कई कहानियां आपने सुनी होंगी। इन्‍हीं कहानियों में से एक कहानी थी राजा जोरावर सिंह कहलुरिया की। राजा जोरावर के बारे में शायद ही आपको ज्‍यादा कुछ मालूम हो। राजा जोरावर, भारत के उन शूरवीरों में से एक थे जिनकी वजह से आज लद्दाख देश की सीमा में है और साथ ही जिन्‍होंने बाल्टिस्‍तान पर भी फतह हासिल की थी। राजा जोरावर को ‘पूरब का नेपोलियन’ तक कहा जाता था।

दुश्‍मन बुलाते थे शेर

इंडियन आर्मी को आज माउंटेन वॉरफेयर का बादशाह माना जाता है। पहाड़ों पर लड़ाई लड़ने का जो कौशल भारत की सेना के पास है वो दुनिया की किसी सेना के पास नहीं है। सेना के इस कौशल की प्रेरणा राजा जोरावर ही थे। राजा जोरावर को आज तक रणनीति का कुशल जानकार माना जाता है। कहते हैं कि उनके दुश्‍मन तक उन्‍हें शेर के तौर पर बुलाते थे। राजा जोरावर, डोगरा राजशाही के महराजा गुलाब सिंह की फौज का हिस्‍सा थे।

180 साल पहले पहुंचे तिब्‍बत

उनका सफर एक सेनापति से शुरू हुआ था लेकिन वो अपनी सेना के जनरल तक बने। 180 साल पहले राजा जोरावर ने तिब्‍बत में माउंट कैलाश पर कदम रखा था। इस जगह को भगवान शिव का घर मानते हैं। उन्‍होंने मानसरोवर झील में डुबकी भी लगाई थी। राजा जोरावर, किश्‍तवाड़ के महाराजा गुलाब सिंह के सबसे भरोसेमंद सैनिक थे। उनका बस एक ही मकसद था कि भारत की सभी सीमाएं चीन से आगे होनी चाहिए।

चीन-पाकिस्‍तान तक राजा जोरावर का डंका

आज भारत और चीन लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर और भारत-पाकिस्‍तान नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर जिन सीमाओं को मानते हैं कहते हैं कि उसकी खोज राजा जोरावर ने ही की थी। तिब्‍बत से सटी भारत की सीमा हो या फिर चीन का शिनजियांग प्रांत, अफगानिस्‍तान का वाखान कॉरिडोर हो या फिर पाकिस्‍तान का खैबर पख्‍तूनख्‍वां प्रांत, इन सभी राजा जोरावर सिंह जिन्‍हें जनरल जोरावर भी कहते थे, उनका ही एकछत्र राज्य था।

संपत्ति विवाद की वजह से छोड़ा था घर

राजा जोरावर का जन्‍म 15 अप्रैल 1784 को हिमाचल प्रदेश में हुआ था। अपने परिवार में संपत्ति विवाद के चलते उन्‍होंने अपना गांव छोड़ दिया और वो हरिद्वार आ गए थे। यहां से उन्‍हें राणा जसवंत सिंह की रियासत में काम करने का मौका मिला। जिस समय वह किश्‍तवाड़ में थे उन्‍हें एक सैनिक के तौर पर ट्रेनिंग मिली। यहां पर उन्‍होंने तलवारबाजी और धनुष बाण चलाना सीखा। 1800 में राजा जोरावर, पंजाब के राजा रणजीत सिंह की सेना में शामिल हो गए थे। इसके बाद वह कंगड़ा के राजा संसार चंद की सेना में एक सैनिक के तौर पर भर्ती हुए थे।

कैसे बदली जिंदगी

1817 में जोरावर सिंह की तकदीर बदलनी शुरू हुई जब उन्‍हें गुलाब सिंह के साम्राज्‍य में जगह मिली। महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने 1808 में जम्‍मू को जीत लिया था। इसके बाद गुलाब सिंह को उनकी तरफ से रियासी की जागीर सौंपी गई थी। जोरावर सिंह यहीं से एक सैनिक के तौर पर आगे बढ़ते गए। 1822 में जब रणजीत सिंह ने गुलाब सिंह को राजा मान लिया तो इसका फायदा जोरावर सिंह को भी हुआ।

1834 में जीत लद्दाख

सन् 1834 में जोरावर सिंह की सेना ने लद्दाख पर जीत हासिल की थी। यह तिब्‍बत और अफगानिस्‍तान के लोगों के लिए व्‍यापार का एक रणनीतिक रास्‍ता था। मुगल भी इसे अपने फायदे के तौर पर देखते थे। लद्दाख के स्‍थानीय गर्वना राजा गियापो चो ऑफ टिम्‍बस ने अपने राजा ग्‍यालपो के खिलाफ, गुलाब सिंह की मदद मांगी थी। गुलाब सिंह ने जोरावर को 4,000 से 5,000 सैनिकों के साथ ग्‍यालपो के खिलाफ लड़ाई के लिए भेजा था। जोरावर सिंह ने भोत-खोल पास को पार किया और फिर पुरिग प्रांत (कारगिल) में दाचिाल हुए। कुछ लड़ाईयों के बाद डोगरा आर्मी ने इसे सुरक्षित कर लिया था।

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